"एकलव्य"

Sunday, 5 March 2017

"मेरी हताशा"


                                                    "मेरी हताशा"   
 "मेरी हताशा"  


मेरी हताशा ....
दिल को जलाती 
कितना रुलाती  
हँसना मैं चाहूँ 
निराशा ये लाती 
मन के भँवर में 
डूबोती ये जाती, 

टूटी सी नौका की ,
पतवार है ये
गहरे समंदर की ,
मजधार है ये,

किनारे हैं ओझल 
जिसकी निशानी 
चारों तरफ़ है 
पानी ही पानी,

पानी नहीं  है 
आँखों का दरिया 
इतना है गहरा 
कोई पता ना,

अँधेरा है फैला 
जिसकी वज़ह से 
न दिखता सवेरा 
सूरज चमन में,

रातें हैं काली 
सपनों को लेकर 
पल-पल रुलाये 
इनकों सँजोकर ,

रातों को जागूँ 
इनकों समेटे
ओढूँ मैं इनकों 
तन पर लपेटे,

करवट मैं बदलूँ 
रातों-पहर 
फैलीं  हैं  आँखों में
बन के लहर,

उठती है, गिरती है
मन में हमेशा 
बहती है बनकर 
रेतों पे सपनें 
कहतीं  हैं बसकर
लिखना यूँ मुझपर 
मेरी हताशा ...मेरी हताशा ... .


                      "एकलव्य"
 "एकलव्य की प्यारी रचनायें " एक ह्रदयस्पर्शी  हिंदी कविताओं का संग्रह
 


   
    
  
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