"एकलव्य"

Saturday, 11 March 2017

"स्वतंत्रता के सही मायनें" 'लेख'

 "स्वतंत्रता के सही मायनें"

                                     

                              "स्वतंत्रता के सही मायनें"  'लेख' 

तर्क!क्या हम स्वतंत्र हैं ?हमने स्वतंत्रता के सही परिदृश्य को समझा अथवा प्रसार किया या हम मिथ्या ही अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर रहें हैं ?
क्या स्वयं की स्वतंत्रता ही राष्ट्र की स्वतंत्रता है, या हम प्रसन्न हैं अपनी स्वयं की ख़ुशहाली पर !
कोई धनवान है !स्वतंत्र है ,कोई अच्छे पद पर कार्यरत है !स्वतंत्र है ,कोई देश की राजनीति में सहभागी है !स्वतंत्र है ,हम अच्छा जीवन व्यतीत कर रहें हैं !मतलब हम स्वतंत्र हैं। 
इस तरह के अनेकों विचार मेरे अंतरात्मा को झकझोड़ देतीं थीं ,जब मैं सत्यता से परिचित होता था। 
आज भी यही परिस्थितियां मन-मस्तिष्क में बारम्बार आतीं रहतीं हैं। 
यही वह मूल कारण है,मेरी लेखनी के क्षेत्र में प्रवेश करने का,क्योंकि मैं राजनेता नहीं जो जनता को भाषणों से आह्लादित करूँ ,मेरे पास एक अनमोल विधा है !लेखनी,जो प्रेरित है इन्हीं अनेकों क्रंदन करते विचारों से। 

बात उस समय की है ,जब मैं अपने अध्ययन के दौरान व्यस्त हुआ करता था ,सूक्ष्मजीवविज्ञान प्रयोगशाला मुझे संसार प्रतीत हुआ करती थी ,मुझे लगता यही जीवन है। मैं स्वतंत्र हूँ ! एक छोटे से प्रयोगशाला के दायरे में। 
जब कभी विश्वविद्यालय में पर्व के अवसरों के उपलक्ष में अवकाश हुआ करता ,मैं अपने जन्म स्थान (काशी) जाने के लिए तैयार होता। 
रेलगाड़ी (लौहपथ गामिनी ) के माध्यम से यात्रा किया करता ,परन्तु ज्यों ही मैं प्लेटफार्म (लौहपथ गामिनी विश्राम स्थल) की ओर प्रस्थान करता कुछ बच्चे अपनी दयनीय दशा (मैले-कुचैले ,फटे कपड़े पहनकर ) में मेरे पीछे दौड़ लगाते चंद पैसों व रोटी के लिये। जेब टटोलते हुए कुछ पैसे उनके हाथ पर रखता ,मन ही मन अपनेआप को  धिक्कारता हुआ गाड़ी में स्थान ग्रहण करता ,रास्ते भर यही सोचता ,मैं इंसान हूँ या पशु या इंसान होने का दिखावा कर रहा हूँ ,ये विचार मेरे मन में तब उतराते जब पास बैठा व्यक्ति यह
कहता नजर आता कुछ यूँ 
"आजकल लोग बेरोज़गारी बढ़ा रहें हैं, इन बच्चों को पैसे देकर इन्हें बढ़ावा दे रहें हैं।" मैं भी मन में अपने आप को कोसने लगता ,गाड़ी मध्यमार्ग में रुकती ,एक बालक (लगभग आठ-दस वर्ष का ) कुचली हुई बोतलों में पानी भरकर बेच रहा था,मैंने वो पानी खरीद लिया (पांच रूपए में ) ,मेरे बगल वाले स्थान पर बैठा व्यक्ति बोला,
"आजकल लोग गलत व्यवसाय को बढ़ावा दे रहें हैं",पुनः मैं विचार करने लगा कि क्या मैंने सही किया ? (पर आज संभवतः उन कथा बाचने वाले व्यक्तियों पर स्वयं लज्जा आने लगी है।) कुछ समय बीत जाने के बाद उन्हीं महानुभावों में से कुछ ज्ञानी श्रीमान ,राजनीति ,देश व स्वतंत्रता  का ब्यौरा देना शुरु कर देते ,एक-दूसरे को वाकयुद्ध में पटखनी देते नजर आते। मैं सहमा-सहमा सा उनके अनमोल विचार सुनता ,देखते-देखते एक बृद्धा जो लगभग असहाय थी (चूँकि द्वितीय श्रेणी में स्थान आरक्षित नहीं होता,जो लड़-लड़ाके पहले पहुँचा स्थान उसका ,स्वतंत्रता का अधिकार !),महिला ने प्रार्थना की कृपया थोड़ी जगह दें ,महानुभावों ने कहा- यहाँ स्थान खाली नहीं है आगे जाइये,जबकि श्रीमान दोनों पैर फैला कर बैठे थे! परंतु स्थान नहीं दे सकते (सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार ) ,मैंने उस महिला को अपना स्थान तो नहीं किन्तु अपने निकट थोड़ा स्थान अवश्य दे दिया ताकि वह  बैठ सके,रोते-धोते मैं अपने गंतव्य को पहुँचा,किन्तु यह यात्रा मेरे मन-मस्तिष्क को सदैव प्रयत्नशील बनाती रही,यह विचार करने के लिए कि क्या हम स्वतंत्रता का सही मायने में अर्थ समझ पायें हैं या नाटकीय ढंग से इसे परोसने का केवल दिखावामात्र  करते हैं, मेरे विचार से ! 

"तब तक हम स्वतंत्र नहीं हैं,जब तक हम अपने स्वयं के स्वार्थ भरे विचारों से पूर्णतया स्वतंत्र नहीं हो 
जाते"




                      "एकलव्य"

 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह


 छाया चित्र स्रोत :  https://pixabay.com/                 .
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