Saturday, 13 January 2018

जीवित स्वप्न !

 जीवित स्वप्न !


चाँद के भी पार होंगे 
घर कई !
देखता हूँ रात में 
मंज़र कई 

चाँदी के दरवाज़े 
बुलायेंगे मुझे 
ओ मुसाफ़िर ! देख ले 
हलचल नई 

वायु के झोंकों से 
खुलेंगी खिड़कियाँ जो 
स्वर्ण की !
पूर्ण होंगी, स्वप्न की वो तारीख़ें 
अपूर्ण सी ! जीवन में 
बनकर रह गईं। 

चाँद के भी पार होंगे 
घर कई !

सूख सी रोटी गई है 
थाल में 
उम्मीद की गर्मियों से 
ताज़ी हो गईं। 

देखता हूँ रात में 
मंज़र कई 
चाँद के भी पार होंगे 
घर कई !


"एकलव्य" 

Friday, 22 December 2017

"फिर वह तोड़ती पत्थर"


"फिर वह तोड़ती पत्थर"

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
'इलाहाबाद' के पथ पर

दृष्टि परिवर्तित हुई
केवल देखने में
दर्द बयाँ करते
हाथों पर पड़े छाले
फटी साड़ी में लिपटी
अस्मिता छुपाती
छेनी -हथौड़ी लिए
वही हाथों में,
दम भर
प्रहार कर

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
इलाहाबाद के पथ पर

परिवर्तित स्थान हुआ
इलाहाबाद से प्रस्थान हुआ
शेष नहीं वह पथ
जिस पर
तोडूं मैं पत्थर

अब तोड़ने लगी हूँ
जिस्मों को
उनकी फ़रमाईशों से
भरते नहीं थे पेट
उन पत्थरों की तोड़ाई से

अंतर शेष है केवल
कल तक तोड़ती थी
बेजान से उन पत्थरों को
अब तोड़ते हैं वे मुझे
निर्जीव सा
पत्थर समझकर

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
इलाहाबाद के पथ पर

कोठे पर बैठी 
फ़ब्तियाँ सहती हुई 
समाज की कुरीतियों से 
जख़्मी मगर 
कुचली जाती 
लज्जा मेरी 
शामों -पहर 
गिरते नहीं हैं 
अश्रु मेरे 
यह सोचकर 

कल तक 
तोड़ती पत्थर 
उसी इलाहाबाद के पथ पर 
जहाँ 'महाप्राण' छोड़ आए 
मुझको सिसकता देखकर 

सत्य ही है आज 
मैं तोड़ती नहीं 
पत्थर 
उस दोपहरी में 
तपते सड़कों पर 
किन्तु जलती 
आज भी हूँ 
अपनी हालत 
देखकर 

हाँ ! मैं  
तोड़ती थी 
पत्थर 
जिसे तूँ खोजता है 
आज 
इलाहाबाद के 
पथ पर 

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
इलाहाबाद के पथ पर 

( उन मंज़िलों के इंतज़ार ने ,कद मेरा छोटा किया )
प्रश्न है "महाप्राण" से  

 "एकलव्य"


Friday, 15 December 2017

''अविराम लेखनी''


''अविराम लेखनी'' 


लिखता जा रे !
तूँ है लेखक 
रिकार्ड तोड़ रचनाओं की 
गलत वही है 
तूँ जो सही है 
घोंट गला !
आलोचनाओं की 
पुष्प प्रदत्त कर दे रे ! उनको 
दिन में जो कई बार लिखें 
लात मार दे ! कसकर 
उनको 
जीवन में एक बार 
लिखें 
लिख -लिख पगले 
भर -भर स्याही 
जब जी चाहे छाती पे 
लगा -लगा कर धूम मचा दे 
सौ टिप्पणियाँ 
'राही' की 
सोच न उनको, जो हैं लिखते 
सत्य काव्य सा अनुभव को 
वो हैं मूरख, सोचने वाले 
करते बातें मानव की 
लिखता जा अविराम लेखनी 
लिखने का तूँ आदी है 
कर दे तूँ सूर्यास्त साहित्य का 
तुझमें हिम्मत बाक़ी है !

आज लिख रहा तेरी महिमा 
अनपढ़ सा मैं सोचने वाला 
वाह रे ! फ़कीर जो तूने किया  
साहित्य समाज का सच्चा रखवाला 


( दिन में सौ रचनायें लिखने वाले सम्माननीय लेखकों को "एकलव्य" का दंडवत नमन। )


"एकलव्य"   

Monday, 4 December 2017

'शोषित'

'शोषित' 


बापू ! बड़ी प्यास लगी है 
पेट में पहले आग लगी है 
थोड़ा पानी पी लूँ क्या !
क्षणभर जीवन जी लूँ क्या !

धैर्य रखो ! थोड़ा पीयूँगा 
संभल-संभल भर हाथ धरूँगा 
दे दो आज्ञा रे ! रे ! बापू 
सौ किरिया, एक बार जीयूँगा

ना ! ना ! 'बुधिया' कर नादानी 
पाप लगेगा पिया जो पानी 
'ब्रह्मज्ञान' ना तुझको 'मूरख' 
करता काहे जान की नौबत 

सुन 'बुधिया' ! कोई देख ले नाला 
ना मंदिर ना कोई 'शिवाला' 
देख नहर में शव जो पड़ा है 
नहीं कोई 'ज़ल्लाद' खड़ा है 

डाल दे अपने कलुषित मुख को 
पी ले नीर ,जो 'आत्मतृप्ति' हो

काहे ऊँची बात तूँ कहता 
धर्म-भेद के चक्कर पड़ता 

जन्म लिया है मेरे घर में 
जन्मजात अधिकार गंवाकर 

आधुनिकता का भाव न भाए 
सारभौम 'शोषित' कहलाये। .. 


( मानवता की प्रतीक्षा में )

"एकलव्य"  

Thursday, 23 November 2017

"पुनरावृत्ति"


"पुनरावृत्ति" 


'सोज़े वतन' अब बताने हम चले 
'लेखनी' का मूल क्या ?
तुझको जताने 
हम चले !

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले ..... 

भौंकती है भूख नंगी 
मरने लगे फुटपाथ पर 
नाचती निर्वस्त्र 'द्रौपदी' 
पांडवों की आड़ में 
हाथ में चक्र है 'सुदर्शन' 
लज्जा बचाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले....... 

धूप में तपते हुए 
वो हाँकता है प्रेम से 
पैरों में 'खड़ाऊँ' नहीं 
वो काँपता है,रातों में 
सर्दी की ठंडी रात्रि में 
वो तापता है आग में 
आग तो उदर में लगी 
कुछ क्षण,बुझाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले.......  

सपनें विखंडित हो चले 
मौसमों की मार से 
कुछ कर्ज़ उसने जो लिए 
गिरवी कर गहने ,उधार के 
सड़कों पर नीलाम हुआ 
'साहूकार' के मार से 
सस्ती हुई है आबरू 
उन कर्ज़ के दुकानों पे 

खरीदने को आबरू 
 बे-आबरू से बाज़ार में 
कौड़ियों से भरकर जेबें  
उनको दिखाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले....... 


( मैं फिर उगाऊँगा ! सपनें नये ) 

"एकलव्य"  

Monday, 13 November 2017

''अवशेष''

''अवशेष'' 


सम्भालो नित् नये आवेग 
रखकर रक़्त में 'संवेग' 
सम्मुख देखकर 'पर्वत' 
बदल ना ! बाँवरे फ़ितरत 
अभी तो दूर है जाना 
तुझे है लक्ष्य को पाना 
उड़ा दे धूल ओ ! पगले 
क़िस्मत है छिपी तेरी 
गिरा दे ! आँसू की 'गंगा'
धुल दे,पाप तूँ सारे 
मैं तो आऊँगा ! अक़्सर 
तय है 'गमन' मेरा 
कल 'मैं' सा रहूँगा तुझमे 
क्षण में टूट जाऊँगा 
पकड़ना चाहेगा मुझको 
पकड़ न आऊँगा तुझसे 
मुँह के बल गिरेगा तूँ 
पश्चाताप है कहके 
धूमिल सी कुटिल वाणी 
सुनेगी ना चिता अग्नि 
कहेंगे 'भस्म' से अवशेष 
बुझती तेरी कहानी  

( अनवरत जारी है ! सत्य की खोज )

"एकलव्य"  

Tuesday, 31 October 2017

''सती की तरह''

"सती की तरह" 

मैं आज भी हूँ 
सज रही 
सती की तरह 
ही मूक सी 
मुख हैं बंधे मेरे 
समाज की वर्जनाओं से 
खंडित कर रहें 
तर्क मेरे 
वैज्ञानिकी सोच रखने वाले 
अद्यतन सत्य ! भूत की वे 
ज्योत रखने वाले 
कभी -कभी हमें शब्दों से 
आह्लादित करते 
संज्ञा देकर देवी का 
शर्त रहने तक 
मूक बनूँ !
बना देते हैं 
सती क्षणभर में 
पीड़ा प्रस्फुटित होने पर 
सारभौमिक यही सत्य !
मैं आज भी हूँ 
सज रही 
सती की तरह 



"एकलव्य" 

एक अनुत्तरित सत्य की खोज आज भी है।