"एकलव्य"

Thursday, 23 March 2017

एक सलाम 'अमर शहीदों' के नाम


                                                      एक सलाम 'अमर शहीदों' के नाम 


उगते सूर्य की किरणों जैसा 
दृढ़ निश्चय सा था वो 
आसमान में उड़ता खग था 
पृथ्वी पर जन्मा था जो 

स्वर में भरा आज़ादी का जज़्बा 
निष्कलंक सा था वो 
नंगी पीठ प्रतीक्षा करतीं 
भयविहीन सा था जो 

लहु में बहतें स्वतंत्रता के कण 
स्वतंत्रता का प्रहरी था वो 
हृदय में बसता एक स्वप्न  
देशस्वप्न सा था जो  

विस्मृत करता देश आज है 
अविस्मरणीय व्यक्तित्व सा था वो 
नाम था जिसका 'भगत सिंह'
सिंह सदृश्य सा था वो 
सपूत देश का था जो ......... 

एक सलाम 'अमर शहीदों' के नाम 

"एकलव्य"   

Tuesday, 21 March 2017

"आओ प्यारे"

                                       

                                                     "आओ प्यारे" 
प्यारी कविता 'देश' के नाम 


रहने दो!
मंदिर,मस्ज़िद ,गुरुद्वारे 
बात करो,इंसान की प्यारे 
मत बाँटो,हमें पृथक धर्म में 
नष्ट करो! बस द्वेष हमारे 

अच्छे लगतें, घण्टें मंदिर के 
अज़ान, कर्णप्रिय लगता है 
क्या होली,क्या ईद देश में 
प्रेम  प्रबल जल बहता है

भाँति-भाँति के फूल खिलें हैं 
उत्तर से दक्षिण में सारे 
ना रोको तुम,धार प्रेम की
बननें दो! यूँ हृदय हमारे

प्रथम नागरिक,भारत का मैं 
जाति-धर्म सब पीछे हैं 
देश महान,बस बने हमारा 
रहने दो !सौहार्द हमारे

दूर करो ! समीकरण धर्म का 
इंसान का पाठ पढ़ाओ प्यारे
गणित का खेल,बड़ा पेचीदा 
मानव कला, सिखाओ प्यारे

देश जो लगता अलग-थलग सा 
मिलकर एक बनाओ प्यारे 
बची रहे,अस्मिता देश की 
प्रहरी बन,जान लड़ाओ प्यारे  
   
सूरज प्रगति का लाओ प्यारे 
एक बनें हम,आओ प्यारे 
स्वर्णकाल तुम, लाओ प्यारे 
प्रेम गीत सब, गाओ प्यारे। ....


'जय भारत' 


                                 "एकलव्य"
 प्यारी कविता 'देश' के नाम

छाया चित्र स्रोत: https://pixabay.com
           

Sunday, 19 March 2017

"गिर जायेंगे,ये ढेर बन"


                                                   "गिर जायेंगे,ये ढेर बन"
 "गिर जायेंगे,ये ढेर बन"



इन आँसुओं से सींच दूँ मैं 
हो कोई सपना अगर 
थाम लूँ,मैं बाजुओं में 
हो कोई अपना मग़र, 

आशायें धूमिल हों चुकीं जो 
आँखों में थीं,तैरतीं 
गिर जायें बनके,गम की बूंदे 
सजल चक्षु,हो मगर

चाहता हूँ,मैं भी उड़ना 
पंखों के,दम पे मगर 
दिख जाये कोई रास्ता 
गंतव्य सत्य का, हो अगर

रोना नहीं मैं चाहता 
भावनाओं के,वशीभूत बन 
माया में लिपटी ज़िंदगी 
ढूंढे खुशी क्यों !हर नगर,

सपनें खड़ें हैं,रेत पर 
ना जानें,क्या ये सोचकर
ज्ञाता नहीं,मैं सत्य का 
गिर जायेंगे,ये ढेर बन।.....गिर जायेंगे,ये ढेर बन।.....


                      "एकलव्य"
 "मेरी रचनायें मेरे अंदर मचे अंतर्द्वंद का परिणाम हैं"  
छाया चित्र स्रोत :https://pixabay.com/

Thursday, 16 March 2017

"जाति-धर्म का ध्वज" 'लेख'


                                             "जाति-धर्म का ध्वज" 'लेख'   


सर्वप्रथम मैं कहना चाहूँगा,हम मात्र इंसान हैं,न कि किसी विशेष धर्म-जाति के परिचायक।
धर्म-जाति का ध्वज वही व्यक्ति ऊँचा करता है जिसका कुछ स्वयं का स्वार्थ अन्तर्निहित हो,यदि आप विज्ञान और प्रौद्योगिकी की बात करतें हैं,तो ये उन स्वार्थपरक जन के लिए एक टेढ़ी खीर हो जाती है क्योंकि विज्ञान तर्क एवं स्पष्ठ प्रमाणों का द्योत्तक है,जो धर्म-जाति के आधार पर उत्पन्न तर्कों को निराधार सिद्ध करता है। 

मानव का एक सारभौमिक स्वभाव है, "सरलता की ओर अग्रसर होना बिना किसी कठनाई के" तो क्यों जटिलता से परिपूर्ण बातें करे ? 
"धर्म एक सीधा व सरल मार्ग है और सरलता का मार्ग प्रारम्भ में उचित प्रतीत होतें हैं किन्तु इसके दूरगामी विध्वंसक परिणाम तय हैं।" लोगों के ह्रदय में व्याप्त जाति-धर्म के नाम पर विद्वेष ,परिणामस्वरुप विनाश एवं गहरे शोक का प्रारम्भ !
संभव है विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के दौर में हम कितनी भी सफलतायें अर्जित कर लें किन्तु विचारों से आज भी हम धर्म एवं जाति की दासता से मुक्त नहीं हो पायें हैं। 
"अतः हमें तर्क आधारित तथ्यों पर अमल करने की आवश्यकता है।" 


                                "एकलव्य"
 "मेरी रचनायें मेरे अंदर मचे अंतर्द्वंद का परिणाम



छाया चित्र स्रोत :  https://pixabay.com/

"हाँ,मैं मन हूँ"


                                                 "हाँ,मैं मन हूँ"
 "हाँ,मैं मन हूँ" 


हाँ मैं मन हूँ 
मानव का करतल हूँ 
आत्मा से द्वेष रखता  
चिरस्थाई महल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ....... 

प्राणी को उद्वेलित करता  
बनके सवेंदनायें,प्रबल हूँ 
बन अशक्त जो बैठा प्राणी 
प्रस्फुटित करता तरंग हूँ
हाँ,मैं मन हूँ....... 

मृत हुई जो तेरी इच्छा 
प्राण फूँकता,नवल हूँ 
भरता हूँ,चेतना की लहरें 
प्रेरणा एक,सबल हूँ
हाँ,मैं मन हूँ....... 

कोई कहे मैं,विचलित होता  
माया रूपी,छल हूँ  
कहते कुछ,पाखंडी मुझको 
दिवास्वप्न में,खल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ.......

विचलित सारथी,तूँ रथ का 
केवल मैं तो,चल हूँ 
मैं कहता,श्रीमान आपसे 
मानव का संबल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ.......हाँ,मैं मन हूँ.......



                      "एकलव्य"
"मेरी रचनायें मेरे अंदर मचे अंतर्द्वंद का परिणाम हैं"  
 
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Wednesday, 15 March 2017

"तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'पाँच'


                                                   "तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'पाँच' 
 "तैरतीं ख़्वाहिशें"



आज़ मैं फिर सपनें देखता हूँ 
आज़ फिर,दिल को सेंकता हूँ 
आज़ फिर वही,मेरी महफ़िल सुनसान 
आज़ फिर वही ,मेरी दुनियां वीरान,

आज़ फिर जहन में वो ख़्वाहिश 
आज़ फिर मेरे सूने आँगन में ,एक नई फ़रमाईश 
आज़ फिर वही होंठों पर आते-आते,लफ्ज़ों का रुकना 
आज़ फिर वही,रुके हुए अल्फाज़ों का होंठों से फिसलना,

आज़ फिर वही,दिल की अधूरी चाहत 
आज़ फिर वही,दिल को थोड़ी सी राहत 
आज़ फिर दिल का फिसलना,एक अज़नबी से रुबरु होकर 
आज़ फिर गिरते-गिरते संभलना,अंजानी राहों से होकर,

आज़ फिर वही,ज़ालिम ज़मानें का फ़ब्तियाँ कसना 
आज़ फिर वही न चाहते हुए भी,लोगों को अनसुनी करना,

आज़ फिर वही,अनजानी महफ़िल में शामिल होना 
आज़ फिर वही,अकेली रातों में कुछ गुनगुनाना,

आज़ फिर वही,अपने चौबारों से लोगों को देखना 
आज़ फिर वही,अनजाने अपने को देखकर दिल का धड़कना,

आज़ फिर वही,इस पागल दिल को समझाना 
आज़ फिर वही,अपने ख़्वाहिशों को फुसलाना,

आज़ फिर वही,गहरे ख़्यालों में डूबना 
आज़ फिर वही,सतह पर उतराना,

आज़ फिर वही,अंधेरे बंद कमरों में चीखना 
आज़ फिर वही,अकेले में यूँ ही बड़बड़ाना 
आज़ फिर वही,जी भर रो लेना 
आज़ फिर वही,निकलते आँसूओं को अपने गर्म हथेली से पोंछना 
और हँसने का झूठा नाटक करना
आज़ फिर वही दूर तक,अकेले ही निकल जाना,

आज़ फिर वही,मैख़ानों में ज़िंदादिली का एहसास 
आज़ फिर वही,लफ्ज़ों पर अधूरी सी प्यास,

आज़ फिर वही,पीकर दुनियां को भुलाना 
आज़ फिर वही,पीने के बाद उनकी याद आना 
आज़ फिर वही,मैख़ानों में अज़नबियों से बातें 
आज़ फिर वही,याद आईं उनके पहलूँ में बीतीं रातें,

आज़ फिर वही,बोतल पे सिर रखकर रोना 
आज़ फिर वही,अपने होशों-हवाश खोना,

आज़ फिर कहीं,गलियों के नालों पर बेसुध पड़ा होना 
आज़ फिर वही,किसी अज़नबी का सहारा लेना,

आज़ फिर वही,अंधेरे कमरे में पड़े-पड़े उनकी याद में रोना 
आज़ फिर वही,अकेले रोते-रोते सोना 
ज़ारी है,आज़ भी 
कल भी
ज़ारी रहेगा अंतिम साँसों तक। बस तेरी याद में......



                   "एकलव्य"
"एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह 
   


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Tuesday, 14 March 2017

"तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'चार'


                                              "तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'चार' 
"तैरतीं ख़्वाहिशें"



कई रातें काटीं हैं,मैखानों में पीते-पीते 
मुक़्क़म्मल ज़िंदगी काट ली,ज़िंदगी जीते-जीते,

आधा सा भरा वो ग्लास,पूरा लगता था 
अज़नबी सा कोई तरन्नुम,अपना सा लगता था,

रात की वो काली स्याही,लगती थी डरावनी उनके बिना 
हवाओं के झोंकों से,दरवाज़े का खुलना-बंद होना 
दिल में ख़लबली सी मचाती थी,उनके बिना,

लाख कोशिशें  करता था,गीली माचिस से चिराग़े रौशन करना 
टकरा कर टूट जाया करतीं थीं तीलियाँ,दीवारों पे घिसते-घिसते,

दिल तो धड़कता है रोज़,अपनी मर्ज़ी से 
ज़िस्म का क्या करूँ,साथ नहीं देता इनका,अपनी ख़ुदग़र्जी से,

हर शाम ज़िंदगी मेरी,मौत को आवाज़ लगाती है बड़ी ही सादग़ी से 
मैं तो दूसरों के जलसे में शामिल हूँ,यह कहकर 
मौत भी मुँह मोड़ लेती है,बड़े अदायगी से,

और कहती है 
फ़िक्र न कर आऊँगी मैं ज़रूर,उस ज़िंदगी से मिलने 
जो तेरी होकर भी,तेरी न बन सकी,

हूँ तो मौत ही सही,रह जाऊँगी तेरे पास 
तेरी ज़िंदगी बनके,

साथ दूँगी तेरा क़यामत तक,जब तक दुनियां बाक़ी है
दूँगी हाथ तब तक तुझे,तेरी परछाईयाँ बाक़ी हैं .........  


                      "एकलव्य"
 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह

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